जस्टिस संजीव शर्मा का जस्टिस संदीप मेहता को जवाब, बोले- पेशेवर ईर्ष्या भी हो सकती है

manish kumar
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राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता की ओर से लगाए गए आरोपों पर अपना पक्ष रखा है। शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इनके पीछे पेशेवर ईर्ष्या की संभावना हो सकती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ी शिकायतों को सार्वजनिक करने के बजाय निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के तहत क्यों नहीं उठाया गया। मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि आरोप अपने आप में किसी जज के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष नहीं होते।

जस्टिस संजीव शर्मा ने क्या कहा?

राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने अपने खिलाफ उठाए गए सवालों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उनके पीछे पेशेवर ईर्ष्या भी एक संभावित वजह हो सकती है। यह उनकी ओर से व्यक्त की गई आशंका है; आरोप लगाने वाले जस्टिस संदीप मेहता की मंशा को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए इंटरव्यू में शर्मा ने कहा कि अगर किसी न्यायाधीश को शिकायत है, तो उसे भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने उठाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों से जुड़े विवादों को सोशल मीडिया पर बहस का विषय बनाने से न्यायपालिका के प्रति आम लोगों के भरोसे पर असर पड़ सकता है।

शर्मा ने अपने न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज का बचाव करते हुए कहा कि किसी भी शिकायत पर उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जाना चाहिए। उनका पक्ष ऐसे समय आया है, जब राजस्थान हाई कोर्ट के प्रशासनिक कामकाज को लेकर न्यायपालिका के भीतर उठे सवाल सार्वजनिक चर्चा में हैं।

जस्टिस संदीप मेहता ने क्या आरोप लगाए थे?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने अगस्त 2026 में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को लिखे पत्रों में राजस्थान हाई कोर्ट के तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए थे।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2, 10 और 17 अगस्त को लिखे गए पत्रों में मेहता ने कथित कुप्रबंधन, भाई-भतीजावाद, पक्षपात और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगाए। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ मामलों की सूचीबद्धता में बदलाव करके उन्हें चुनिंदा पीठों के सामने भेजा गया और प्रभावशाली मुकदमेबाजों को लाभ पहुंचाने की स्थिति पैदा हुई।

मेहता ने राजस्थान हाई कोर्ट का नेतृत्व करने के लिए दूसरे राज्य से मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की मांग भी की थी। ये सभी आरोप उनके द्वारा उठाई गई शिकायतों का हिस्सा हैं। इन्हें न्यायिक जांच या सक्षम संस्थागत प्रक्रिया से स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

केस लिस्टिंग और रोस्टर को लेकर विवाद क्या है?

हाई कोर्ट में मामलों को अलग-अलग पीठों के सामने सूचीबद्ध करना और न्यायाधीशों को काम आवंटित करना प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुख्य न्यायाधीश की भूमिका में रोस्टर तय करने और मामलों के आवंटन से जुड़े अधिकार भी आते हैं।

जस्टिस मेहता की शिकायतों में आरोप था कि इन अधिकारों का इस्तेमाल कुछ मामलों को चुनिंदा तरीके से एक विशेष पीठ के सामने भेजने के लिए किया गया। उनके अनुसार, कुछ मामले अन्य पीठों से हटाकर जस्टिस शर्मा की पीठ में स्थानांतरित किए गए।

दूसरी ओर, शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने प्रशासनिक फैसलों का बचाव किया है। उन्होंने मामलों के आवंटन और न्यायिक कार्यवाही को लेकर उठाए गए सवालों पर आपत्ति जताई है।

इस विवाद के केंद्र में यही प्रश्न है कि प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल किस प्रक्रिया के तहत किया गया और शिकायतों के समर्थन में प्रस्तुत सामग्री का संस्थागत स्तर पर क्या आकलन होता है। इसका उत्तर संबंधित रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया से ही स्पष्ट हो सकता है।

CJI सूर्यकांत ने मामले पर क्या रुख अपनाया?

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अगस्त 2026 में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों और कॉलेजियम ने जस्टिस मेहता की ओर से उठाई गई चिंताओं का संज्ञान लिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों पर स्थापित संस्थागत प्रक्रिया के तहत ही विचार होना चाहिए।

हिंदुस्तान टाइम्स और इंडिया टुडे की रिपोर्टों के अनुसार, CJI ने कहा था कि केवल आरोप लगाए जाने से उन्हें किसी न्यायाधीश के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। जस्टिस शर्मा को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना भी जरूरी है।

इस रुख का मतलब है कि शिकायतों और उनके जवाब का आकलन उचित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। सार्वजनिक बयान, मीडिया रिपोर्ट या सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा अपने आप में किसी आरोप को साबित नहीं करती।

जस्टिस शर्मा ने पेशेवर ईर्ष्या का जिक्र क्यों किया?

जब जस्टिस शर्मा से पूछा गया कि जस्टिस मेहता ने उनके खिलाफ आरोप क्यों लगाए, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी निश्चित वजह मालूम नहीं है। हालांकि, उन्होंने पेशेवर ईर्ष्या को एक संभावित कारण बताया।

शर्मा ने अपने और मेहता के पेशेवर जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों को वर्ष 2011 में वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया था। उन्होंने अपने चयन और पेशेवर पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए दोनों के अनुभवों में अंतर का भी जिक्र किया।

यह बयान जस्टिस शर्मा की ओर से लगाए गए अनुमान को दर्शाता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि पेशेवर ईर्ष्या ही शिकायतों की वास्तविक वजह थी। इसके लिए स्वतंत्र और पुष्ट प्रमाण आवश्यक होंगे।

राजस्थान हाई कोर्ट के नेतृत्व में क्या बदलाव हुआ?

इस विवाद के बीच राजस्थान हाई कोर्ट के नेतृत्व को लेकर भी घटनाक्रम सामने आया। द इंडियन एक्सप्रेस की 1 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल के नाम की सिफारिश की थी। यह घटनाक्रम जस्टिस शर्मा के अवकाश पर जाने के बाद सामने आया।

हालांकि, नेतृत्व से संबंधित प्रशासनिक निर्णय और किसी न्यायाधीश के खिलाफ लगाए गए आरोप दो अलग-अलग बातें हैं। किसी नियुक्ति या प्रशासनिक बदलाव को अपने आप आरोपों की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

इस मामले की रिपोर्टिंग में घटनाओं की तारीख, संबंधित संस्थागत निर्णय और प्रत्येक पक्ष के बयान को अलग-अलग समझना जरूरी है।

न्यायपालिका में शिकायतों की प्रक्रिया क्यों महत्वपूर्ण है?

उच्च न्यायपालिका से जुड़े आरोप केवल संबंधित न्यायाधीशों तक सीमित नहीं रहते। उनका असर संस्थागत पारदर्शिता, न्यायिक प्रशासन और जनता के भरोसे से भी जुड़ता है। इसलिए शिकायतों का निष्पक्ष आकलन और संबंधित व्यक्ति को जवाब देने का अवसर महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस मामले में एक तरफ जस्टिस मेहता की ओर से प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ जस्टिस शर्मा ने उन्हें खारिज किया है। CJI सूर्यकांत ने भी इस बात पर जोर दिया था कि ऐसे मामलों का निर्णय सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।

अभी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आरोपों, जवाबों और संबंधित रिकॉर्ड का समुचित आकलन जरूरी है। किसी आरोप को दोहराते समय उसके स्रोत और स्थिति को स्पष्ट करना भी समाचार रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा है।

अब आगे क्या महत्वपूर्ण होगा?

इस विवाद में आगे की महत्वपूर्ण जानकारी संस्थागत प्रक्रिया, संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयानों और किसी पुष्ट प्रशासनिक निर्णय से मिल सकती है। यदि सक्षम प्राधिकारी कोई निष्कर्ष या निर्णय जारी करता है, तो उसे मूल दस्तावेज या विश्वसनीय रिपोर्ट के आधार पर प्रकाशित किया जाना चाहिए।

फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में जस्टिस मेहता की शिकायतें, जस्टिस शर्मा का जवाब और CJI का उचित प्रक्रिया पर जोर शामिल हैं। इन तीनों पहलुओं को साथ रखकर ही घटनाक्रम की संतुलित तस्वीर सामने आती है।

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